इन ब्रह्मचारियों ने दिन रात का पहरा लगा कर देख लिया कि यह तो आश्रम के निकट रहने वाली शबरी ही कर रही है ।
5.
इसी जंगल में न जाने कितने मानुस मार गिराए गए थे, तब से रात का पहरा लगने लगा था ……….. अब बचने की उम्मीद बेकार थी।
6.
पर पता नहीं अचानक क्या हो गया सब कुछ फिसल सा गया छिपा गए वे सारी बातें गहरी-सी चुप गहरी-सी रात का पहरा हो गया धरे-धराये रह गए सारे चाव वे अचानक चले गए।
7.
रात भर चाँद चलता रहा रात का पहरा ढलता रहा सुबह के आगोश में आने को चाँद का मन मचलता रहा सुरमई साँझ से निकला चाँद बदली की ओट में छुपता रहा रात का आँचल ढलते ही सुबह के साये में गुम हुआ सूने से आकाश में चमके यूँ पूनम का चाँद....
8.
इतना सबकुछ होते-होते रात का पहरा आधा हो चुका था समय देख कर आँखो मे नींद भर आयी आँखे अधेरे मे कब खो गयी समझना थोडा मुस्किल था पूरा शरीर एक सुनेपन को लिए हुए पड़ा रहा सान्त कानो ने बाँस के फटाक से खुलने को सुना ये आवाज शरीर मे एक तरंग भर कर चली गयी ।
9.
बेशक़ पिता लोरी नहीं सुनाते माँ की तरह आँसू नहीं बहाते पर दिन भर की थकन के बावजूद रात का पहरा बन जाते हैं और जब निकलते हैं सुबह तिनकों की खोज में किसी के खिलौने किसी की किताबें किसी की मिठाई किसी की दवाई … परवाज़ पर होते हैं घर भर के सपने पिता कब होते हैं ख़ुद के अपने?